पिछले कुछ समय से एक बात बहुत ज़ोर-शोर से कही जा रही थी कि भारत अंतरराष्ट्रीय दबाव में आ जाएगा। कहा जा रहा था कि अमेरिका के सामने भारत को झुकना पड़ेगा, भारत को मजबूर होकर समझौता करना पड़ेगा और भारत की विदेश नीति विफल हो जाएगी। लेकिन जब सच सामने आया, तो कहानी बिल्कुल उलटी निकली।
हाल ही में अमेरिका ने भारत पर लगाए जाने वाले टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया। यह फैसला कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं था, बल्कि इसके पीछे रणनीति, धैर्य और शांत कूटनीति काम कर रही थी। इस पूरे घटनाक्रम को समझना आज हर भारतीय के लिए ज़रूरी है।
टैरिफ होता क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
टैरिफ का मतलब होता है — किसी देश के सामान पर लगाया गया आयात कर।
जब कोई देश दूसरे देश से आने वाले सामान पर ज़्यादा टैरिफ लगाता है, तो उस सामान की कीमत बढ़ जाती है और उसका बाज़ार कमजोर हो जाता है।
अगर भारत के उत्पादों पर अमेरिका में 50% टैरिफ लगता, तो:
भारतीय कंपनियों को नुकसान होता
Make in India को झटका लगता
भारतीय निर्यात कमजोर होता
लेकिन टैरिफ 18% होने का मतलब है कि:
भारतीय उत्पाद अब अमेरिका में ज़्यादा प्रतिस्पर्धी होंगे
निर्यात बढ़ेगा
रोज़गार के नए अवसर बनेंगे
यानी यह सिर्फ आंकड़ों की जीत नहीं, आर्थिक और रणनीतिक जीत है।
क्या भारत ने दबाव में आकर समझौता किया?
इस सवाल का जवाब बहुत साफ है — नहीं।
भारत ने न तो किसी को उकसाया,
न सोशल मीडिया पर शोर मचाया,
न किसी तरह की जल्दबाज़ी दिखाई।
भारत ने वही किया जो एक आत्मविश्वासी राष्ट्र करता है:
बातचीत
संतुलन
और राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखना
यही वजह है कि आज परिणाम भारत के पक्ष में है।
दूसरे देशों से तुलना क्यों ज़रूरी है?
जब हम वैश्विक राजनीति को देखते हैं, तो तुलना बहुत कुछ स्पष्ट कर देती है।
चीन पर 30% से ज़्यादा टैरिफ
कनाडा पर 35%
मेक्सिको पर 25%
बांग्लादेश और वियतनाम पर 20%
इन सबके बीच भारत का 18% पर आना यह दिखाता है कि भारत को कमज़ोर नहीं, गंभीरता से लिया जा रहा है।
कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि UK या EU का टैरिफ कम है। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि वे अमेरिका के रणनीतिक साझेदार हैं, जबकि भारत एक स्वतंत्र नीति वाला राष्ट्र है, जो बराबरी के स्तर पर बात करता है।
मोदी–ट्रंप बातचीत का महत्व
इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब प्रधानमंत्री Narendra Modi और अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के बीच बातचीत हुई।
यह बातचीत केवल औपचारिक नहीं थी। इसमें:
व्यापार
ऊर्जा
वैश्विक स्थिरता
और भविष्य की रणनीति
सब पर चर्चा हुई।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी बातचीत का मतलब होता है कि दोनों देश एक-दूसरे को गंभीरता से ले रहे हैं।
रूसी तेल और वेनेज़ुएला पर फैलाई गई भ्रांतियाँ
एक और बड़ा भ्रम यह फैलाया गया कि भारत ने रूसी तेल लेना बंद कर दिया। सच्चाई यह है कि भारत ने:
तेल लेना पूरी तरह बंद नहीं किया
बल्कि अपनी ज़रूरत और परिस्थिति के अनुसार मात्रा कम की
यह निर्णय भावनाओं पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित पर आधारित था।
इसी तरह वेनेज़ुएला से तेल लेने को लेकर भी भ्रम फैलाया गया, जबकि पहले से ही व्यापारिक समझौते मौजूद थे, जो परिस्थितियाँ बदलने पर फिर सक्रिय हुए।
प्रधानमंत्री का संदेश और उसका सही अर्थ
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि यह फैसला 1.4 अरब भारतीयों के हित में है।
इस पर कुछ लोगों ने अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश की।
हमें यह समझना होगा कि:
प्रधानमंत्री किसी वर्ग या समूह के नहीं, पूरे देश के प्रतिनिधि होते हैं।
राष्ट्रीय मंच पर वही भाषा बोली जाती है जो देश की सामूहिक पहचान को दर्शाए।
इस पूरे घटनाक्रम से हमें क्या सीख मिलती है?
शोर मचाने से नहीं, रणनीति से देश आगे बढ़ता है
अंतरराष्ट्रीय रिश्ते भावनाओं से नहीं, संतुलन से चलते हैं
आलोचना ज़रूरी है, लेकिन अपमान राष्ट्रहित के खिलाफ है
शांत कूटनीति अक्सर सबसे बड़ी जीत दिलाती है
यह जीत सिर्फ सरकार की नहीं, भारत की कार्यशैली की जीत है।
निष्कर्ष: भारत झुका नहीं, भारत आगे बढ़ा
आज यह स्पष्ट है कि भारत:
आत्मसम्मान के साथ खड़ा है
वैश्विक मंच पर परिपक्व भूमिका निभा रहा है
और बिना शोर किए अपने हित सुरक्षित कर रहा है
टैरिफ का 50% से 18% होना इस बात का प्रमाण है कि भारत को अब दबाया नहीं जा सकता, बल्कि समझौता बराबरी से करना पड़ता है।
यह जीत आज की नहीं, आने वाले वर्षों की नींव है।
जय सनातन 🚩
वंदे मातरम् 🇮🇳

Social and Political Commentar, Nationalist, Mission to Make Positive Impact
Email suniltams@gmail.com

Guruji Sunil Chaudhary
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