मनुस्मृति, ब्राह्मणत्व और कर्म का राष्ट्र विमर्श

जय सनातन।
वंदे मातरम्।
भारत माता की जय।

आज जिस विषय पर बात हो रही है, वह किसी जाति के विरोध का विषय नहीं है, बल्कि कर्तव्य, कर्म और उत्तरदायित्व का प्रश्न है। यह लेख ब्राह्मण के विरुद्ध नहीं, बल्कि ब्राह्मणत्व के पक्ष में है। यह लेख मनुस्मृति को जलाने वालों से अधिक, उसे भुला देने वालों से प्रश्न करता है।

यह लेख पढ़ना आसान नहीं है, क्योंकि सत्य अक्सर कठोर होता है।
पर सनातनी कभी सत्य से भागता नहीं

मनुस्मृति : ग्रंथ नहीं, दायित्व

मनुस्मृति केवल एक पुस्तक नहीं है।
मनुस्मृति समाज संचालन की चेतना है।
मनुस्मृति कर्तव्य आधारित वर्ण व्यवस्था का आधार है।

यदि आज एक सामान्य सनातनी यह कहता है कि उसे मनुस्मृति के बारे में अधिक ज्ञान नहीं है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—

यह विफलता किसकी है?

मनुस्मृति का अध्ययन, अध्यापन और समाज में विवेकपूर्ण प्रस्तुति किसका दायित्व था?

उत्तर स्पष्ट है—
ब्राह्मण का।

ब्राह्मण : जन्म नहीं, दायित्व

ब्राह्मण कोई उपनाम नहीं है।
ब्राह्मण कोई जातिगत प्रमाणपत्र नहीं है।

ब्राह्मण वह है—
जो पढ़े,
जो पढ़ाए,
जो समाज को दिशा दे,
जो सत्ता को मर्यादा सिखाए,
जो संस्कृति की रक्षा करे।

यदि समाज दिशाहीन हो जाए,
यदि धर्म उपहास का विषय बन जाए,
यदि ग्रंथ जलाए जाने लगें,
तो दोष समाज का नहीं—
नेतृत्व का होता है।

और सनातन समाज में वैचारिक नेतृत्व ब्राह्मण का ही होता है

इतिहास का कटु प्रश्न : जयचंद क्यों पैदा हुए?

जब मुगल आए,
तो वे केवल तलवार लेकर नहीं आए,
वे फूट, लालच और भ्रम लेकर आए।

पर प्रश्न यह नहीं कि मुगल आए।
प्रश्न यह है—

उन्हें सहयोग किसने दिया?

लालची राजा कैसे बने?
राष्ट्रविरोधी निर्णय कैसे लिए गए?

राजा के पीछे कौन होता है?
गुरु।

और गुरु का कार्य किसका है?
ब्राह्मण का।

यदि गुरु मौन हो जाए,
तो सिंहासन दिशाहीन हो जाता है।

अंग्रेज़ और बौद्धिक पराजय

अंग्रेज़ तलवार से नहीं जीते।
उन्होंने मस्तिष्क पर अधिकार किया।

शिक्षा बदली गई,
इतिहास विकृत किया गया,
मैकाले की मानसिकता थोपी गई।

और प्रश्न फिर वही—

ब्राह्मण कहाँ थे?

जो समाज को चेतना देते हैं,
यदि वही मौन हो जाएँ,
तो विदेशी विचार घर कर जाते हैं।

आज की स्थिति : चार वर्ण और एक रिक्तता

आज भारत में—

  • वैश्य अपना व्यापार कर रहा है

  • शूद्र सेवा क्षेत्र को संभाल रहा है

  • क्षत्रिय सुरक्षा में खड़ा है

पर प्रश्न है—

ब्राह्मणत्व कहाँ है?

जो समाज को जोड़ता था,
जो शब्दों से संस्कार रचता था,
जो दिशा देता था—

वह भूमिका आज कमजोर क्यों है?

नाम नहीं, कर्म

तिवारी, दीक्षित, शुक्ल, चतुर्वेदी—
इन नामों से कोई ब्राह्मण नहीं बनता।

और
चौधरी, जाट, ठाकुर—
इन नामों से कोई अयोग्य नहीं हो जाता।

कर्म ही पहचान है।

जो ज्ञान दे,
जो समाज को जोड़े,
जो राष्ट्र के पक्ष में खड़ा हो—
वही ब्राह्मण है।

जातिवाद : राजनीति का विष

गाँवों में कभी यह विष नहीं था।
समाज एक था।
कार्य विभाजन था, भेदभाव नहीं।

राजनीति ने—
जाति को हथियार बनाया,
वर्ण को गाली बनाया,
और समाज को बाँटा।

और इस विष का प्रतिरोध किसे करना था?

ब्राह्मण को।

समाधान : अब आगे क्या?

आरोप बहुत हो चुके।
अब समाधान की बात।

१. ब्राह्मणत्व का पुनर्जागरण

हर वह व्यक्ति जो पढ़ता-पढ़ाता है,
जो विचार देता है—
उसे आगे आना होगा।

२. नकारात्मक वाक्य बंद

“हिंदू कभी एक नहीं होगा”
यह वाक्य अपराध है।

अब कहना होगा—
हिंदू एक है, था और रहेगा।

३. संगठन और समिति

एकल तप नहीं,
सामूहिक साधना चाहिए।

समाज, मंदिर, संस्कृति—
हर स्तर पर समितियाँ बनें।

४. मौन त्यागो

जहाँ अन्याय दिखे,
वहाँ चुप रहना पाप है।

ज्ञान का मौन
अधर्म को बल देता है।

मनुस्मृति का सार

मनुस्मृति कहती है—
कर्तव्य पहले, अधिकार बाद में।

यदि हर वर्ण
अपना कर्म ईमानदारी से करे—

तो
न जातिवाद बचेगा,
न भ्रम,
न विघटन।

अंतिम आह्वान

यह लेख किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं,
बल्कि सबको ऊँचा उठाने के लिए है।

यदि आप स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं—
तो यह लेख आपकी जिम्मेदारी है।

यदि आप सनातनी हैं—
तो यह लेख आपका दायित्व है।

अब समय आ गया है—

ब्राह्मण जन्म से नहीं, कर्म से बनें।
सनातन राष्ट्र केवल नारा नहीं, संकल्प बने।

जय सनातन।
वंदे मातरम्।
भारत माता की जय।

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